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सेहत नेचुरोपैथी से

6:12 AM

सेहत नेचुरोपैथी से


क्या है नेचुरोपैथी ?

नेचुरौपैथी एक जीवनशैली है, जिंदगी का सादगी भरा अंदाज है, जो शरीर को बीमारी की स्थिति से बचाता है। मगर इलाज भी  इसके जरिए होते है। अगर व्यक्ति बीमार हो जाए, तो प्रकृति के पांच तत्वों की मदद भी ली जाती है।

महात्मा गांधी नेचुरोपैथी में बेहद यकीन रखते थे-उनका मानना था कि प्रकृति के माध्यम से इलाज इतना आसान और सस्ता है कि ज्यादा से ज्याता लोगों को इसका इस्तेमाल करना चाहिए।

प्रकृति किसी के साथ धोखा नहीं करती। अगर हम उसकी शरण में जाए, तो वह हर संभव तरीके से मदद करती है। अगर बीमार पड़ भी जाए, तो किसी भी बीमारी, दर्द या जख्म का इलाज पांच तत्वों आकाश, हवा, पानी, अग्नि और धरती के माध्यम से किया जाता है। इसमें माना जाता है कि सभी बीमारियों का कारण लगभग एक ही होता है, वह है शरीर में विषैले तत्वों का जमाव, जो धीरे-धीरे किसी न किसी बीमारी का रूप ले लेता है। क्योंकि बीमारी का कारण  एक ही है, शरीर में विजातीय और विषैले तत्व-इसलिए नेचुरोपैथी में इनका इलाज भी एक ही होता है। शरीर में विषैले तत्व कैसे जमा हो जाते हैं? हमारा शरीर विभिन्न कोशिकओं से बना है, जो निरंतर मृत होती रहती हैं और उनकी जगह नई कोशिकांए लेती रहती हैं। पुरानी मृत कोशिकाओं का शरीर से बाहर निकलना जरूरी होता है, यही नहीं जीवित कोशिकाएं भी ऐसे विषैले पदार्थ उत्पन्न करती हैं, जो हमें बीमारी की ओर ले जाते हैं।

अप्राकृतिक जीवनशैली के चलते भी शरीर में टॉक्सिन्स बनते हैं। अगर ये विषैले तत्व समय-समय पर शरीर से बाहर न निकले, तो शरीर में बीमारियां उत्पन्न होने लगती है।

नेचुरोपैथी का मानना है कि कीटाणु शरीर में तब उत्पन्न होते हैं, जब शरीर में विषैले तत्व ज्यादा जमा हो जाते हैं। अगर शरीर साफ रहे, तो कीटाणु  उत्पन्न ही नहीं होगे और न कोई रोग होगा। एक स्वस्थ शरीर में, जहां नियमित सफाई होती रहती है, वहां कीटाणुओं को पनपने का मौका नहीं मिलता। कीटाणु बीमारी का परिणाम है, कारण नहीं। प्राकृतिक चिकित्सा में इस बात को पहचानकर ही इकाज किया जाता है। कीटाणुओं पर समय नष्ट करने से अच्छा है, शरीर की सफाई की जाए। प्राकृतिक चिकित्सा इसी प्रक्रिया में मदद करती है, ताकि खून साफ हो, शरीर की गांठे खत्म हों और कीटाणु न उपजें।  मानसिक और शारीरिक व्यायाम से शरीर के विषैले तत्व दूर होते हैं, क्योंकि ज्यादा ऑक्सीजन मिलती है, साथ ही रक्त संचालन भी तेज होता है। 
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सेब हर मौसम में

1:26 PM





सेब एक फल हेै, जिसे किसी भी मौसम में दिन- रात किसी भी समय
खा सकते हैं, जबकि दूसरे फलों के लिए समय देखना पड़ता है। 
खाने में यह सुविधाजनक हैं। बस अच्छी तरह धोकर बिना काटे
खाइए, फ्रूट सलाद बनाकर भी या फिर कस्टर्ड आदि में डालकर।
स्वाद बदलने के लिए आपको कुछ रेसिपी भी हम यहां दे रहे हैं--

गरमागरम सेब-लौंग सूप

अपना दिन धीमी आंच पर तैयार इस सूप के साथ आरंभ करेंगे तो रहेंगे दिनभर तरोताजा।

सामग्री

  • मीठा सेब    ( छिला और छोटे- छोटे टुकड़ों में कटा हुआ)- 1
  • लौंग - 5
  • पानी - 1/4 कप
विधि - 


  • लौंग, सेब को पानी को पतीले में डालें और ढ़ककर धीमी आंच पर रखें।
  • गलने तक पकाएं।
  • लौंग निकालें, हल्का ठंडा करें और आनंद भी उठाएं और स्वास्थ्य भी पाएं। 

सेब की चटनी 





सामग्री -- 

  • सेब -  दो
  • धी-     एक चम्मच
  • चीनी - एक चम्मच
  • दालचीनी पाउडर- एक चुटकी
  • जीरा - एक चौथाई चम्मच
  • नमक - स्वादानुसार
विधि -- 

  • सेब छीलकर छोटे टुकड़ों में काट लें।
  • एक बर्तन में धी गर्म कर जीरा डाल लें।
  • जब भूरा हो जाए, तो आग कर करें और सेब तथा दूसरी सामग्री डाल दें।
  • अच्छी तरह चलाकर ढक दें।
  • पक जाए, तो टोस्ट पर रखकर खाएं।


ऐपल ड्रिंक


  • ऐपल जूस - एक कार्टन
  • संतर के छिलके घिसे हुए - दो चम्मच
  • दालचीनी - तीन छोटी स्टिक
  • लौंग - एक चम्मच
विधि
  • संतरे के छिलके, दालचीनी व लौंग किसी एक मलमल के कपड़ें में बांध लें।
  • एक बरतन में ऐपल जूस गर्म करें और मलमल में बंधे मसाले इसमें कुछ देर के लिए छोड़ दें।
  • इसके बाद इसे दालचीनी की स्टिक से सजाकर सर्व करें। 








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परीक्षा से पहले बच्चा सुंतुलित भोजन कर रहा है न ?

6:06 PM
परीक्षा से पहले बच्चा सुंतुलित भोजन कर रहा है न ?


 इन दिनों बच्चों का ज्यादा समय पढ़ाई करते बीतता है।
कहीं वे मानसिक या शारीरिक रूप से कमजोर तो नहीं हो रहे...........



परीक्षा के दिन हों और बच्चे पढ़ाई में लगे हो, तो माता-पिता को बेहद  तसल्ली मिलती है। उन्हें लगता है कि बच्चे मेहनत कर रहें हैं, पढ़ाई में व्यस्त हैं, तो फिर और क्या चाहिए। वे अच्छे रिजल्ट के इंतजार में बैठ जाते हैं। मगर बहुत से माता-पिता को यह नहीं रहता कि परीक्षा के समय बच्चों के पोषण और स्वास्थ्य का ध्यान रखना तो जरूरी है ही, उनके मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी जरूरी है।


बहुत सी मांएं इन दिनों पढ़ाई के चक्कर में अपना खाना-पीना तो भूल जाती हैं, साथ ही तनाव में भी आ जाती हैं। उनसे न घर का काम ठीक से होता है और न रसोई में ही ज्यादा समय वे बिताती हैं। उन्हें लगता है कि जो समय वे रसोई में देंगी, उस समय का उपयोग क्यों न वे बच्चे को पढ़ाने में करें।

ब्रेड-बटर, बर्गर या नूडल्स बना कर वे बच्चे के साथ उसकी पढ़ाई में व्यस्त हो जाती हैं। नतीजा यह कि एक ओर जहां बच्चा उनके तनाव को देख कर परेशान होता है, वहीं उसे खाना भी ठीक से नहीं मिल पाता।





इन दिनों बच्चों को चाहिए फल, सब्जी दूध और दालें, साथ ही कार्बोंहाइड्रेट्स। ध्यान रखें कि उनके भोजन में दूध, दही, दलिया और दालों की कमी न हो। हां, इन दिनों उनका खेल-कूद थोड़ा कम होता है, इसलिए भारी भोजन उन्हें खाने को न दें।

नाश्ते में अनाज, फल, दूध और कुछ मीठा अवश्य दें। इससे उनकी याद्दाशत बढ़ती हैं।

फल दिमाग को हल्का और सक्रिय रखते हैं। कच्ची गाजर सलाद के तौर पर जरूर दें। फलों में प्राकृतिक रूप से मौजूद शुगर, मस्तिष्क में सूचनाओं को तेजी से इकट्ठा करने में मदद करती है, जिससे उसमें तेजी से काम करने की शक्ति पैदा होती है। दिमाग के लिए ईधन हैं, फल। हां. परीक्षाओं के समय मैदे से बनी वस्तुओं से परहेज करें। कुछ ऐसे आहार भी होते हैं, जो दिमाग को सुस्त करते हैं। डबलरोटी जैसे चिपचिपे पदार्थ को पचाने में अधिक वस्त लगता है, ऊर्जा भी अधिक खर्च होती है। मोटे अनाज दिमाग को चुस्त रखने में मदद करते है। नाश्ते में जो बच्चे कैलशियम से भरपूर आहार लेते हैं। उनका व्यवहार भी ठीक रहता है और उनमें सीखने की क्षमता भी विकसित होती है।


संपूर्ण आहार के लिए 

अगूंर, सेब या संतरा खाने को दें। जूस की जगह फल काटकर खाने को दें। फल में मौजूद रेशे रक्त को साफ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।


परीक्षा से पहले बच्चा सुंतुलित भोजन कर रहा है न ?सब्जियां

हरी-पत्तेदार सब्जियों का सूप, गाजर, इत्यादि नियमित रूप से दें।

अनाज

गेंहूं, चनाम सोयाबीन भोजन में शामिल करें।

कैल्शियम

कैल्शियम ना केवल हडि्डयों को मजबूती प्रदान करता है, बल्कि बढ़ते दिमाग के विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। अगर बच्चा दूध पसंद न करे, तो दही और घर का बना पनीर आदि दें।

नाश्ते और दोपहर के भोजन में कम कैलरी और अधिक प्रोटीन युक्त आहार लेना चाहिए, इससे दिन भर ताजगी रहती है और रात को नींद अच्छी आती है। दोपहर में यदि पढ़ना है, तो अधिक मीठा न दें।

आयरन

बच्चे को भरपूर लौह तत्व दें। हरी पत्तेदार सब्जियों जैसे पालक, सरसों, बीन्स, मोटा अनाज, अंडे और मेवे खाने को दें। इनमें भरपूर आयरन होता है। कहा जाता है कि बच्चे में आयरन की कमी से चिड़चिड़ापन बढता है और एकाग्रता नही रह पाती । बच्चा अगर संतुलित भोजन करे, तो वह नम्र और बुद्धिमान बनता है।

      याद रखें,   अच्छा भोजन अच्छे नतीजे लाने में उसकी मदद करेगा। 


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रहें सावधान तो ना हो बच्चे बीमार

2:14 PM

सावधानी हटी नहीं कि बच्चा पड़ जाता है। बीमीर। ऐसे में आप अपना भरपूर समय उसे देने का प्रयास करते हैं। तो क्या बढ़िया हो, यदि आप बच्चे के स्वास्थ्य के प्रति हमेशा ही चौकन्ने रहें।


रहें सावधान तो ना हो बच्चे बीमार


पेट संबंधी समस्याएं

पेट संबंधी समस्याएं आम हैं जो लगभग 10 फीसदी बच्चों को होती हैं। यह अमूमन शिशु के दो-तीन सप्ताह के होने पर आरंभ हो जाती हैं। यहां तक कि लगातार दो घंटे तक भी रह सकता है। पेट की समस्याएं आमतौर पर अधिकतर ढलती दोपहर और आंरम्भ होती शाम को होती हैं।

बच्चा जैसे-जैसे छटे सप्ताह तक पहुंचता है, पेट की कई समस्याएं स्वयं ही हल होने लगती है। लेकिन तीन-चार माह का होने पर काफी हद तक वे समस्याओं से मुक्ति पा लेते हैं। बहरहाल आप बच्चे की कई तरीके से मदद कर सकते हैं, जैसे उसे घुमाने ले जाना, गुनगुने पानी से नहलाना, मीठा संगीत सुनाना, और प्रेम से थपकी देकर सुलाना इत्यादि।

दांत निकलने पर

बच्चे के प्रथम दांत तीन से 16 माह में आ जाते है। सबसे पहले सामने नीचे के दो दांत आते हैं। और फिर चार से आठ सप्ताह में चार ऊपर के दांत आते हैं। तीन वर्ष का होने पर उसके सभी प्राइमरी दांत आ जाते हैं। और हर चार माह में उसके चार नएं दांत आते है।
 दांत आने पर हल्का दर्द होता है और मसूड़े फूल जाते हैं। इससे निचात दिलाने के लिए उसके मसूड़ों की साफ और हल्के हाथों से मालिश करनी चाहिए। शिशु के दांतों को मलमल के नरम कपड़े से साफ करें और थोड़ा बड़ा होने पर मुलायम बेबी ब्रश से दांत साफ कर सकतें हैं। बच्चे के ब्रश पर मटर के दाने के बराबर फ्लोराइड रहित पेस्ट लगाएं। लगातार दांतों के आसपास पहुंचने वाली चीनी उसके दांतों और मसूड़ों के लिए खतरनाक साबित हो सकती है।

एनीमिक तो नहीं


रहें सावधान तो ना हो बच्चे बीमार


एनीमिक यानी खून की कमी भी बच्चों में आम देखी जा सकी हैं। यह स्थिति तब आती है जब शरीर में लाल रक्त कोशिकाएं बहुत कम हो जाएं। चूंकि लाल रक्त कोशिकाओं में हीमोग्लोबिन होता है, जो शरीर के उत्तकों के ऑक्सीजन देता है। शरीर में लौह तत्व की कमी से जूझने के लिए प्राकृतिक रूप से बचाव के रास्ते उपलब्ध रहते हैं। जन्म के बाद शिशु में हीमोग्लोबिन का स्तर करीब दो माह तक काफी कम रहता है। लेकिन इसके इलाज की जरूरत नहीं होती। बच्चे के शरीर में खुद ब खुद रक्त कोशिकाएं बनने लगती है। यदि बच्चे के खानपान का ध्यान ना रखा जाए तो वह रक्त की कमी का शिकार हो सकता है।
होठों में गुलाबीपन ना रहना, त्वचा में पीलापन दिखना, चिडचिड़ापन बढ़ना, थकावट रहनी, सिर में दर्द रहना, सुस्त रहना, इत्यादि। कई बार यह स्थिति बहुत गंभीर हो जाती है, इस स्थिति में लाल रक्त कोशिकाएं डॉक्टरी इलाज द्वारा ली जाती है। दवाइयों द्वारा भी इलाज किया जाता है। ये दवाएं रक्त कोशिकाओं को नियंत्रण में लाती हैं और उन्हें जल्दी- जल्दी नष्ट नहीं होने देतीं। कुछ मामलों पर बोन मैरो ट्रांस्प्लांट किया जाता है।



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जैविक खेती : विज्ञान और परंपरागत पद्धति में करियर

5:08 PM

जैविक पद्धति में रासायनिक उर्वरकों, रासायनिक कीटनाशकों तथा खरपतवार नाशकों की अपेक्षा गोबर की खाद, कम्पोस्ट, हरी खाद, बैक्टीरिया कल्चर, जैविक कीटनाशकों जैसे साधनों से खेती की जाती है।.


जैविक खेती : विज्ञान और परंपरागत पद्धति में करियर



पिछले कुछ महिनो पहले 14 फरवरी, 2018 को विश्व के सबसे बड़े जैविक खेती (आर्गेंनिक फार्मिग) थिंक टैंक इंटरनेशनल फोरम फॉर आर्गेंनिक एग्रीकल्चर मूवमेंट्स ( आईएफओएम ) तथा रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर आर्गेंनिक एग्रीकल्चर द्वारा संयुक्त रूप से जारी अध्ययन रिपोर्ट के अनुसार जैविक खेती करने वाले उत्पादकों की सबसे अधिक संख्या भारत में है। भारत में 8 लाख 35 हजार से अधिक लोग जैविक खेती कर रहे है। दूसरे स्थान पर मेक्सिको है जहां 2 लाख 10 हजार लोग जैविक खेती कर रहे है।


जैविक खेती : विज्ञान और परंपरागत पद्धति में करियर
इस रिपोर्ट के अनुसार विश्व में 57.8 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में जैविक खेती की जा रही है। विश्व मे 178 देश जैविक खेती कर रहे है। जैविक उत्पादों का वैश्विक बाजार 89.7 बिलियन यूएस डॉलर को पार कर गया है। इस रिपोर्ट में कहा गया है। कि खेती का भविष्य जैविक खेती ही है।

उल्लेखनीय है कि भारत में सर्वप्रथम वर्ष 2001-02 में जैविक खेती को लेकर गंभीरता दिखाई गई और 42,000 हेक्टेयर क्षेत्र से जैविक खेती की शुरूआत हुई। वर्ष 2022 तक भारत में 20 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में जैविक खेती किए जाने की संभावना विभिन्न रिपोर्टों में बताई गई है।

उल्लेखनीय है कि यूरोप, जापान तथा सं.रा. अमेरिका जैसे देशों में बच्चों में कैंसर के अधिक मामले सामने आने पर अब पांच साल तक के बच्चों के लिए जैविक खाद्य पदार्थ अनिवार्य कर दिए गए हैं। कुछ समय पहले तक हमारे देश में भी लोग रासायनिक खाद पर ही पूरी तरह से निर्भर थे। परंतु अब हमारे देश में भी स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता के चलते जैविक खेती के द्वारा तैयार उत्पादों की मांग तेजी से बढ़ती जा रही है। इसते चलते इस क्षेत्र में करियर की बेहद चमकीली संभावनाएं उत्पन्न हो गई है।


जैविक खेती : विज्ञान और परंपरागत पद्धति में करियर


गौरतलब है कि जैविक खेती वह सदाबहार कृषि पद्धति है, जो पर्यावरण की शुद्धता को बरकरार रखती है
जैविक खेती भूमि के प्राकृतिक स्वरूप को बनाए रखती है। मिट्टी की जल धारण क्षमता बढ़ाती है। इसमें रसायनों का उपयोग बिलकुल नहीं या नगण्य होता है और कम लागत में गुणवत्तापूर्ण उत्पादन होता है। जैविक पद्धति में रासायनिक उर्वरकों, रासायनिक कीटनाशकों तथा खरपतवार नाशकों की अपेक्षा गोबर की खाद, कम्पोस्ट, हरी खाद, बैक्टीरिया कल्चर, जैविक खाद, जैविक कीटनाशकों जैसे साधनों से खेती की जाती है।

उल्लेखनीय है कि मिट्टी में असंख्य जीव रहते है। जो एक- दूसरे के पूरक तो होते ही है, साथ ही पौधों के विकास के लिए पोषक तत्व भी उपलब्ध कराते है। भारत में पहले से ही गोबर की खाद, कम्पोस्ट, हरी खाद और जैविक खाद का प्रयोग विभिन्न फसलों की उत्पादकता बढ़ाने के लिए किया जाता रहा है।


जैविक खेती : विज्ञान और परंपरागत पद्धति में करियर


जैविक खाद बनाने के लिए पौधों के अवशेष, गोबर, जानवरों का बचा हुआ चारा आदि सभी वस्तुओं का प्रयोग किया जाता है। जैविक खेती का मूल उद्देश्य तेजी से बढ़ती जनसंख्या के मद्देनजर मृदा संरक्षम की प्रक्रियाएं अपनाते हुए जैविक तरीकों से कीट तथा रोग पर नियंत्रण रखते हुए फसलों के उत्पादन को बढ़ाना है, ताकि लोगों को सुरक्षित तथा स्वास्थकारी कृषि उत्पाद उपलब्ध हो सकें और साथ ही कृषि प्रक्रियाओं में पर्यावरण तथा प्राकृतिक संसाधनों की कम से कम क्षति हो।


भारत में पहले से ही गोबर की खाद, कम्पोस्ट, हरी खाद और जैविक खाद का प्रयोग विभिन्न फसलों की उत्पादकता बढ़ाने के लिए किया जाता रहा है।......

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मां दुर्गा विसर्जन के समय प्रार्थना

8:09 PM
नवरात्र के नौ दिन हम पूरी निष्ठा और श्रद्धा से देवी मां की पूजा-अर्चना करते हैं तथा नवरात्र के बाद भावभीनी विदाई के साथ उनकी प्रतिमा का विसर्जन कर दिया जाता है। 


मां दुर्गा विसर्जन के समय प्रार्थना

नौ दिन तक हम देवी की पूरी निष्ठा और हर्षोल्लास से पूजा करते हैं तथा नवरात्र के बाद भावभीनी विदाई के साथ उनका विसर्जन कर दिया जाता हैं। विसर्जन का संस्कृत में अर्थ है-- विदा करना या पानी मे विलीन कर देना।
विसर्जन के पीछे अनेक कारण हैं। पौराणिक तथ्य़ों के अनुसार, मां नौ दिन अपने मायके में रहने आती है। नवें दिन इन्हें मायके से ससुराल विदा कर दिया जाता हैं। अन्य मान्यतानुसार, महाशक्ति (महादेवी) योग निद्रा की यह मूर्तियां भगवान विष्णु (जल तत्व ) से अलग होकर नहीं रह सकती, अत: इन्हे जल में विसर्जित करना भक्तों का परम कर्तव्य माना जाता है। तीसरी मान्यतानुसार, माँ दुर्गा का महिषासुर के साथ नौ दिन तक युद्ध चला था, अंत में वह महिषासुर का वधकर महिषासुरमर्दिनी कहलाई। तभी से हर्षोंल्लास के साथ नवदुर्गा का पूजन किया जाता है। चूंकि इन दिनों पूजा के नियम और विधान बड़े कड़े होते हैं और पूरे साल उनका पालन नहीं किया जा सकते हैं, अत: नवरात्र के बाद मूर्ति/ज्वारे विसर्जन की प्रथा है। अष्टमी/नवमी के दिन कन्या पूजन के बाद हाथ में चावल के दाने और फूल लेकर संकल्प लें तथा  मां को प्रणाम करते हुए कहें। कि मां आप हमारे यहां पधारी, आपका बड़ा अनुग्रह है। हमारे ऊपर अपनी कृपा बनाए रखना तथा अगले वर्ष पुन: आना। इसके पश्चात घट पर स्थापित नारियल को प्रसाद स्वरूप सभी को बांट देना चाहिए। घट का जल सारे घर में छिड़क देना चाहिए। सुपारी को भी प्रसाद के रूप में वितरित कर दें। घट पर रखे सिक्के को तिजोरी या गुल्लक में रख ले, इससे सारे वर्ष लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है। चौकी या सिंहासन के वापस  मंदिर में रख दें। मां को अर्पित साड़ी प्रसाद स्वरूप ग्रहण कर लें तथा जेवर को संभाल कर रख दें। गणेश प्रतिमा को पुन: मंदिर में स्थापित कर दें। चढ़ावे की मिठाई को प्रसाद के रूप में बांट दें। पूजा स्थल पर बिखरे चावल अथवा भोग को पक्षियों को डाल दें।


मां दुर्गा विसर्जन के समय प्रार्थना


मां दुर्गा की प्रतिमा तस्वीर, जौ तथा पूजा सामग्री को जल में प्रवाहित कर दें। पश्चिम बंगाल में पष्ठी से लेकर दशमी तक पूजा की जाती है। प्रतिमा को षष्ठी को स्थापित किया जाता है, इस समय उनका चेहरा ढका रहता है। बोधन के बाद षष्ठी को शाम को चेहरा खोला जाता है। दुर्गा पूजा के पश्चात दशमी को मां को विदाई दी जाती है। हमारे यहां जिस प्रकार लड़की की शादी के समय रात को विदाई नहींं करते अगले दिन कन्या को सिंदूर या सुहाग चढ़ाया जाता है, उसी प्रकार मां अष्टभुजा को भी दशमी को सिंदूर चढ़ाया जाता है। इसे सिंदूर खेला  कहा जाता है। सभी मां को सिंदूर लगाने के बाद एक-दूसरे को सिंदूर लगाते है। कई लोग मां के पैर से सिंदूर लेकर पोटली में भी रख लेते है। मां दुर्गा के पैरों से सिक्का स्पर्श कर भी अपने पास रख लेते हैं।

मां दुर्गा के विसर्जन के समय हर बंगाली हर बंगाली पूजा खत्म होने के बाद दोबारा आने की प्रार्थना करते हैं। घट से लौटकर लोग फिर से पंडाल में मिलते हैं। शांति जल मिलता है। शाम को सभी छोटे बड़ों के पैर छूते हैं, प्रणाम करते हैं तथा बच्चों को आशीर्वाद और पैसे मिलते हैं।

विसर्जन के बाद सभी मां के पुन: आगमन की प्रार्थना करते हैं। किसान अच्छी फसल के लिए प्रार्थना करते हैं। सुहागिनें सदा सुहागन रहने की प्रार्थना करती हैं। भक्त परिवार-कुटुम्ब की खुशहाली की प्रार्थना करते हैं, ज्यादातर व्यक्ति अपने व्यक्तिगत सुखों की कामना करते हैं। जिन कन्याओं को हम देवी की तरह पूजते हैं, उनकी सुरक्षा की प्रार्थना या कामना करनी चाहिए। लोक कल्याण, समाज और देश कल्याण की प्रार्थना करनी चाहिए। देवी से रूप और यश की कामना के साथ सद्बुद्धि की कामना भी करें।



मां दुर्गा विसर्जन के समय प्रार्थना मां दुर्गा विसर्जन के समय प्रार्थना Reviewed by YoGi on 8:09 PM Rating: 5

नवरात्र में मां गंगा का पूजन

12:49 PM
नवरात्र में मां गंगा का पूजन


कलिकाल में गो, सूर्य चंद्रमा, गीता, गंगा ये प्र्त्यक्ष देवी-दैवता है। इसमें भी माता गंगा सर्वोपरि है। बिना गंगाजल के तो किसी अनुष्ठान की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। माता गंगा पहाड़ में बाल्यावस्था में रहती हैं तथा सर्वप्रथम मैदान में (हरिद्वार में) आते ही युवती बन जाती है। तथा काशी पहुंचते-पहुंचते प्रौढ़ावस्था का रुप ले लेती है। तथा बंगाल में वृद्धावस्था को प्राप्त करके सागर में मिल जाती हैं। हरिद्वार में आते ही युवती बनी गंगा लोगों की हर प्रकार की मनोकामनाओं की पूर्ति करने वाली हो जाती हैं। यहां का ज्ञान पूरे कलियुग में मोक्षदायी होती है। काशी का ज्ञान विश्व प्रसिद्ध है। यहा गंगा का स्वरूप दिव्य हो जाता है। कनखल-हरिद्वार में गंगा एक शक्ति त्रिभुज का निर्माण करती है,

पृथ्वी पर शक्तिपीठ मायादेवी का स्थान है, गंगा के दोनों ओर शिवालिक पर्वत है। नीलपर्वत पर माता चंड़ी का स्थान है तथा दूसरी तरफ माता मनसा का स्थान है। यदि इन दोनों मंदिरों को मिलाते हुए एक रेखा खींचे तथा एक रेखा गंगा किनारे मायादेवी के मंदिर तक खींचे , तो यह एक शक्ति का त्रिकोण बनता है, जोकि समस्त शक्ति पीठों का आधार है, यहीं से शक्ति का संचार होता है।

नवरात्र में नवदुर्गा की पूजा की जाती है, जिनमें शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंद माता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है, इसमें गंगाजल का विशेष योगदान रहता है।

नवरात्र के प्रथम दिन गंगा पूर्व में, दूसरे दिन उत्तर पूर्व में, तृतीय दिन उत्तर दिशा, चतुर्थ दिन उत्तर पश्चिम, पंचम दिन पश्चिम दिशा में, छठे दिन दक्षिण-पश्चिमी कोण में, सप्तम दिन दक्षिण दिशा में, अष्टम दिन दक्षिण-पूर्व में तथा नवम दिन आकाश गंगा में रहती हैं।


नवरात्र में मां गंगा का पूजन
मां गंगा

नवरात्रों की पूजा में गंगा स्नान के बाद नवग्रहों, षोडशमात्रिकाओं के साथ गंगा पूजन भी अनिवार्य है तथा नवरात्र के अलग-अलग दिन भी गंगा में उसी दिशा की ओर मुख करके स्नान किया जाता है, जिस ओर गंगा का निवास होता है। प्रत्येक ग्रह भी नवदुर्गा से जुड़ा है। सूर्य का संबध शैलपुत्री से, चन्द्रमा का सबंध ब्रह्मचारिणी से, मंगल का संबंध चन्द्रघंटा से, बुध का संबंध कूष्मांडा से, गुरु का संबंध स्कंदमाता से, शुक्र का संबंध कात्यायनी से, शनि का संबंध कालरात्रि से, राहू का संबंध महागौरी से तथा केतु का संबंध सिद्धिदात्री से ज्योतिष शास्त्र में बताया गया है। इनका भी स्थान ठीक उसी प्रकार से उसी दिशा में कहा जाता है, जहां जिस दिन गंगा जिस दिशा में रहती है।

गंगा की मिट्टी का विधान बहुत ही स्पष्ट है। कहा  गया हा कि दुर्गा की मूर्ति अष्टभुजा या चतुर्भुजा जो भी बनाई जाती है, उसे गंगा की मिट्टी में मिलाकर ही बनाया जाता है। जब गंगा की मिट्टी से मूर्ति बनाई जाती है, तो उसमें जो रंग भरा जाता है, उसमें रोशनाई भी गंगाजल में मिलाकर बनाने का विधान है। फिर जब षोडोपचार पूजा किसी भी मूर्ति की होती है, वह चाहे मिट्टी स्वर्ण, पीतल, रजत, किसी भी धातु की हो, उसको स्नात नवरात्र में गंगाजल के द्वारा ही कराया जाता है। जो अमृत कलश रखा जाता है उसमें अष्टधातु पंचपल्लव के साथ गंगाजल ही भरा जाता है। इसके बाद आचमन, स्नान, पवित्री स्नान भी गंगाजल के द्वार ही किया जाता है। नवरात्र में शक्ति पूजन के विधान के साथ नवग्रहों की पूजा भी ग्रह शांति के लिए की जाती है तथा इसी समय में दशमहाविद्याओं की पूजा की जाती है, मत्सय पुराण अध्याय (102) में वर्णन किया है। कि नवरात्रों या किसी भी शक्ति के अनुष्ठान में बिना गंगा स्नान किए शरीर की शुद्धि नहीं होती और फल नहीं मिलता।





गंगा स्नान करते समय हाथ में गंगाजल लेकर संकल्प बोलकर ही गंगा पूजा करनी चाहिए कि हे मां आप विष्णु के चरण से उत्पन्न हुई हो, मेरी रक्षा करो तथा मेरा अनुष्ठान जो नौ दिन का है, उसे पूर्ण करो। अंतरिक्ष व पृथ्वी पर गंगा 35 करोड़ तीर्थों का निर्माण करती है, क्योकि माता गंगा ब्रह्मा के कमंडल से निकलकर, विष्णु के चरणों को धोते हुए, शिव का अभिषेक करते हुए पृथ्वी लोक पर आती है।

अत: तीनों देवों ब्रह्मा, विष्णु, महेश तथा उनकी शक्तियों महासरस्वती, महालक्ष्मी, महाकाली का गुण गंगाजल में विद्यमान है। इन तीनों शक्ति के इस रूप को ही अमृत कहा जाता है। बिना इस अमृत के कोई भी शक्ति पूजा नहीं की जा सकती ।




                                 
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रंगो की शक्ति और नवरात्र की भक्ति

5:51 PM

                  रंग सिर्फ जीवन में ही नहीं, धार्मिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण हैं। धार्मिक मान्यतानुसार,
               विभिन्न देवी-देवताओं के भी पसंदीदा रंग होते है। माता रानी की कृपा आप पर बरसती रहे, 
               इसके लिए नवरात्र के हर दिन मां की पसंद के रगं के वस्त्र धारण कर पूजन करना चाहिए। 

रंगो का हमारे देवी-देवताओं, पर्वो और त्योहारों से भी विशेष जुड़ाव है। हर रंग किसी न किसी देवी या देवता को प्रिय होता है। ऐसे में नवरात्र पर्व में भी प्रत्येक दिन किस रंग के कपड़े धारण करने चाहिए, इसे ध्यान में रखकर आप माता रानी की विशेष कृपा प्राप्त कर सकती है। नवरात्र में हर दिन अलग-अलग रंगों के कपड़े पहनने से धर में सुख-समृद्धि आती है।


रंगो की शक्ति और नवरात्र की भक्ति



नवरात्र के नौ दिनों में नौ रंगो के कपड़े पहनने और मां की पूजा करने का खास महत्व है। नवरात्र के नौ दिन काले कपड़े पहनना वर्जित होता है। इन्हें धारण करने से पूजा निष्फल हो जाती है और अशुभ फल मिलता है।

 नवरात्र का पहला दिन प्रतिपदा का दिन कहलाता है। इस दिन पर्वतराज हिमालय की पुत्री माता  शैलपुत्री का पूजन किया जाता है। ये ही नवदुर्गाओं में प्रथम है। भक्तों को माता शैलपुत्री को भूरे रंग की साडी पहनाकर श्रृगांर करना चाहिए। इसके अलावा भक्तों को भी इस दिन पीले रंग के कपड़े पहनकर भक्ति में लीन होना चाहिए। पूजा के दौरान और पूजा के बाद भी इस रंग के कपड़े पहनना शुभ होता है। नवरात्र के दूसरे दिन माता ब्रह्मचारिणी की उपासना की जाती है। ब्रह्म का अर्थ होता है। तपस्या और चारिणी का मतलब होता है।  आचरण, यानी ब्रह्मचारिणीं का अर्थ हुआ तप का आचरण करने वाली।

भक्तों को दूसरे दिन माता का नारंगी रंग से श्रृगार करना चाहिए, वहीं भक्ति में डूबे भक्तों को हरे की पोशाक पहनना चाहिए। नवरात्र के तीसरे दिन मां दुर्गा के तीसरे रूप माता चंद्रघंटा का पूजन होता है। माता चंद्रघंटा को श्वेत रंग की पोशाक धारण कराएं। वहीं भक्त अगर इस दिन भूरे रंग के कपड़े पहनते है, तो देवी मां को अधिक प्रसन्नता होती है।

नवरात्र के चौथे दिन दुर्गा मां के चौथे रूप माता कूष्मांडा की आराधना की जाती है। ये दिन बहुत पवित्र होता है। भक्त पूरी निष्ठा और मन से देवी की पूजा करते हैं। भक्तों को लाल रंग की पोशाक में माता कूष्मांडा का श्रंगार करना चाहिए। वहीं भक्तों  को खुद नारंगी रंग के कपडे पहनकर माता का आशीर्वाद लेना चाहिए।

नवरात्र के पांचवे दिन माता स्कंदमाता की पूजा-अर्चना की जाती है। दुर्गा मां का पांचवा रूप स्कंदमाता मोक्ष के दरवाजे खोलने वाली और सुख देने वाली हैं। श्रद्धा भाव से पूजा करने वालों की सारी इच्छाएं पूरी होती है। इस दिन देवी मां का नीले रंग की पोशाक में श्रृगांर करना चाहिए। वहीं भक्तों के लिए संफेद रंग के कपड़े पहनना शुभ होता है।






दुर्गा मां का छठा रूप माता कात्यायनी है। भक्तों को इस दिन माता कात्यायनी का पीले रंग से श्रगांर करना चाहिए। इस दिन भक्तों को लाल रंग के कपड़े पहनना चाहिए। नवरात्र के सातवें दिन माता कालरात्रि की पूजा की जाती है। माता कालरात्रि के शरीर का रंग श्याम है, सिर के बाल बिखरे, गले में माला और तीन आंखे होती है।

भक्तों को सप्तमी के दिन नीले रंग के कपड़े पहनना चाहिए। अष्टमी को महागौरी की पूजा की जाती है। कई भक्त इस दिन तक ही व्रत रखते है। माता महागौरी का मोरपंखी रंग से श्रृगांर करना चाहिए। इस दिन भक्तों के लिए गुलाबी रंग के कपड़े पहनना शुभ माना जाता है। नवरात्र के नौवें दिन मां सिद्धिदात्री भक्त को सिद्धि का आशीर्वाद देती है। भक्तों के लिए इस दिन जामुनी रंग के कपड़े पहनना शुभ माना जाता है।   
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नवरात्र के व्रत में क्या भोजन खाना चाहिए

4:09 PM
व्रत आहार ग्रहण करने के भी नियम हैं                 

                                               


नवरात्र के नौ दिन जीवन साधने की कला के दिन है, ताकि जीवन सार्थक हो सके। नवरात्र में देवी को साधना और आध्यात्म का अद्भुत संगम होता है। लोग अपनी मनोकामना पूरी करने और देवी मां को खुश करने के लिए व्रत रखते है। कुछ श्रद्धालु प्रथम और अंतिम दिन का व्रत रखते है, जबकि कई भक्त पूरे नवरात्र का व्रत करते है। अब सवाल .यह उठता है। कि व्रत में खानपान किस प्रकार का होना चााहिए, ताकि व्रत करने से स्वास्थ्य पर कोई परिवर्तन ना पडे़। आयुर्वेद की मानें, तो इस बदलते मौसम में हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता अपने आप कमजोर हो जाती है। इसलिए उपवास के माध्यम से हल्का व सुपाच्य आहार लेकर आप अपने शरीर और मन दोनों को नई ऊर्जा से भर सकती हैं। उपवास के दौरान शरीर में विषैले तत्व तेजी से बाहर निकलने लगते हैं। यह शरीर का डिटॉक्सीफिकेशन कहलाता है। इससे शरीर चुस्त-दुरुस्त और हल्का लगने लगता है।





डाइटिशियन कहते है। कि नवरात्र में नौ दिन का व्रत प्राय: सभी लोग रखते है। मगर कुछ लोग ही सही डाइट को फॉलो कर पाते है। नतीजा दो-तीन दिन के बाद ही तबीयत बिगड़ने लगती है। डिहाड्रेशन, बदहजमी, सिर दर्द आदि की समस्या होने लगती है। लेकिन सही समय पर सही डाइट लेकर आप नवरात्र का व्रत कर सकती हैं। उपवास के दौरान डिहाड्रेशन से बचने के लिए लिक्विड डाइट ज्यादा लें। इनमें पानी, जूसम छाछ, नारियल पानी,  के साथ दूध आदि भी शामिल करें। तरल पदार्थ की सही मात्रा शरीर को हल्का रखेगी ही, आवश्यक मिनरल्स व विटामिन्स के जारिये ऊर्जा भी देती रहेगी, जिससे आप थकावट व आलस का अनुभव नहीं करेंगी। हल्के ठोस आहार के रूप में आप सेंधा नमक वाली साबूदाने की खिचड़ी का प्रयोग कर सकती है। कार्बोंहाइड्रेट से भरपूर साबूदाना तुरंत ऊर्जा देने में सक्षम है। बीच-बीच में खाने के लिए फलों की चाट भी फायदेमेंद है, क्योकि फलों में कैलोरीज कम होती है। और इनमें कार्बोंहाइड्रेट और फाइबर प्रचुर मात्रा में होते है। सेब, अनार, केला, पपीता, खजूर का सेवन करे। इसके साथ ही लौकी और उबले आलू का प्रयोग फलाहार के रूप में कर सकती है। दूध से बनी हुई चीजें उपवास में विशेष रूप से खाएं। व्रत में कूट्टू, सिंघाडे के आटे की रोटी बनाकर हरी चटनी के साथ खाने का आनंद लें।

सीताफल की सब्जी व सावां के चावल की खिचड़ी दही के साथ खा सकती है। व्रत के दौरान ताजा दही आप ले सकती है। दही का प्रोटीन गुणकारी होता है। इससे 60 कैलोरी ऊर्जा मिलती है। इसीलिए व्रत में थोडा-सा दही खाने से प्यास भी अधिक नहीं लगती।

अगर आप व्रत के दौरान अपना वजन नहीं बढ़ाना चाहती हैं, तो आलू या आलू के चिप्स खाने की बजाए ताजे फल-सब्जियों की सलाद खाएं। व्रत के दौरान तल-भूना खाने से बचें। नमकीन और पकौड़े खाने की बजाए रोस्टेड मखाने का प्रयोग करें। आप रोजमर्रा से अलग संतुलित और नियंत्रित, पौष्टिक और हल्का खाना खाएंगे, तो शरीर और मन दोनों को नई ऊर्जा मिलेगी। इस बात का जरूर ध्यान रखें कि उपवास में खाने के बीच लंबा अंतराल न रहे।

                                            
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Hubble Space Telescope

1:28 PM
 Hubble Space Telescope, disoriented, takes a nap to reboot

The Hubble Space Telescope, NASA's jewel of the skies, is temporarily out of service. On Friday, the telescope stood down from observing stood down from observing and put itself into "safe mode" after one of its gyroscopes, which keep it aimed at objects of scientific interest, died.


Hubble Space Telescope


NASA has appointed a review board to investigate the gyroscope problem. The telescope carries a total of six gyroscopes, but only three are needed to run the telescope. The others serve as backups.
During Hubble's early years the gyroscopes died often, and replacing them was one of the main tasks of servicing missions. During the last and final servicing mission, in May 2009, astronauts installed six new gyroscopes. Two have since died, leaving a backup and three working gyroscopes, one of which expired Friday.

But when ground controllers tried to bring the backup gyroscope online, it behaved erratically, sending garbled messages back ot the ground, said Ken Sembach, director of the Space Telescope Science Institute in Baltimore, which operates the telescope.

The instrument may simply need to be rebooted, Sembach said in a brief telephone interview Monday. But he added,  "We don't want to start flipping switches until we understand what's happening."

Sembach said that the review board would need at least a few days to reach any conclusion. Hubble can operate with just two gyroscopes if necessary, as it did from 2005 to 2009 while waiting for astronauts to come fix it. Even one gyroscope will do in a pinch.

The flow of heavenly cosmic postcards has stopped for now, but Sembach said that Hubble still has years of good science ahead of it. 
Hubble Space Telescope  Hubble Space Telescope Reviewed by YoGi on 1:28 PM Rating: 5

आखिरी जन्मदिन पर बापू क्या कर रहे थे?

3:40 PM
आखिरी जन्मदिन पर बापू क्या कर रहे थे?

जो शख्स कभी सवा सौ साल जीना चाहता था और अपनी चाहत के लिए पूरी तरह आश्वस्त भी था। महज 78 वसंत के बाद ही उसकी हिम्मत टूट-सी गई है। बापू अब जीना नहीं चाहते। अपने जन्मदिन से एक दिन पहले एक अक्टूबर, 1947 को बापू शाम की प्रार्थना में कहते हैं, भगवान मुझे अपने पास बुला ले। वह अपने प्यारे देश को हर दिन बर्बाद होता नही देख सकते। वह चाहते हैं सब कुछ खत्म हो, उससे पहले ही उनकी आंखे यह सब देखना बंद कर दें।

आखिरी जन्मदिन पर बापू क्या कर रहे थे?दो अक्टूबर, 1947 की तारीख आने से कुछ घंटे पहले से ही गांधी आत्म शुद्धि के लिए चौबीस घंटे का व्रत शुरू कर चुके हैं। स्वतंत्र भारत में अपने पहले जन्म दिवस के दिन गांधी जी रोज की तरह ब्रह्म मुहूर्त में उठते हैं। नित्य क्रियाएं खत्म करके वह चरखा चलाते हैं फिर गीता के श्लोक पढ़ने के बाद ध्यान में लीन हो जाते हैं। ध्यान करते वक्त वह शायद 78 बरस पहले का दिन सोच रहे हैं, जब वह पोरबंदर में पैदा हुए थे। वह अपनी माता पुतलीबाई की प्रसव पीड़ा को भी याद कर रहे हैं। निश्चित तौर पर उनके दिमाग में 1876 के उस दिन की स्मृतियां कौंध रही हैं, जब उन्होने पहली बार राजा हरिश्चंद्र पर आधारित नाटक देखा था और उससे खूब प्रभावित हुए थे। उसी दिन मोहनदास के मन में यह खयाल आया था। कि हरिश्चंद्र की तरह हर कोई सत्य का पुजारी आखिर क्यों नहीं हो सकता? कस्तूरबा से विवाह और इंग्लैड जाकर वकालत की पढ़ाई, जीवन के हर अहम मोड़ को उन्होने याद किया। हां, दक्षिण अफ्रीका की रेलगांड़ी में हुए अपने साथ दुर्व्यवहार को वह भला कैसे भूल सकते हैं। 1915 में भारत वापसी के बाद के अपने प्रत्येक संधर्ष को वह याद कर रहे हैं।

बापू की तबीयत ठीक नहीं है। वह थोडी-थोड़ी देर बाद खांस रहे हैं। हालांकि यह उनका पहला जन्मदिन नही है, जब उनकी तबीयत खराब रही हो। पचासवें जन्मदिन पर तो साबरमती में उनकी हालत इस कदर बिगड़ गयी थी कि उनके पुत्रों को टेलीग्राम से सूचित किया गय़ा कि उन्हें अपने पिता के पास आना चाहिए। लेकिन तब गांधी मरना नहीं चाहते थे, तब ईश्वर से उनकी प्रार्थनाएं और अपेक्षाएं अलग थी और आज बिल्कुल अलग है।

दिन चढ़ने के साथ कई लोग उन्हें जन्मदिन की बधाई देने के लिए आ रहे हैं। लोग उन्हें आजाद भारत का राष्ट्रपिता कहकर संबोधित कर रहे हैं। गवर्नर-जनरल माउंटबेटन अपनी लेडी एडविना के साथ पधारे हैं। देश के उप प्रधानमंत्री सरदार पटेल उन लोगों में शामिल हैं, जो सबसे पहले सुबह ही शुभकामना संदेश के साथ बापू के पास पहुंचे हैं। प्रधानमंत्री नेहरू, उद्योगपति जीडी बिरला, राजकुमारी अमृत कौर, मुस्लिम-सिख समुदायों के शीर्ष नेता और कैबिनेट के अन्य सदस्यों ने बापू लोगों की शुभकामनाओं की फीकी प्रतिक्रिया दे रहे हैं। शाम की प्रार्थना के वक्त बापू अपने अनुयायियों को संबोधित करते हुए कहते हैं, मै जबसे भारत लौटा हूं, तभी से मैने देश में सांप्रदायिक सौहार्द बनाने को अपना काम मान है। लेकिन आज हर कोई एक-दूसरे का दुश्मन बन बैठा हैं। मेरी सभी कोशिशें बेकार गई। मुझे नहीं लगता कि अब मेरे जीने की कोई भी वजह बची है। मैंने सवा सौ साल जीने का ख्वाब छोड़ दिया है। मैं आज से अपने 79वें साल में प्रवेश कर रहा हूँ और यह मुझे दर्द दे रहा है। अगर आप लोग सच में मेरा जन्मदिन मनाना चाहते हैं, तो आप अपने मन से एक-दूसरे के प्रति नफरत मिटा दें। मैं आपसे बस यही चाहता हूं। ईश्वर हमारे साथ हैं। ........

                                                                                                     -- वी राममूर्ति की पुस्तक महात्मा गांधी द लास्ट 200 डेज के अंश ।  
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नीम के फायदे चेहरे और त्वचा के लिए

9:24 PM
neem
Neem
सबसे बड़ा हकीम आपका नीम

नीम का इस्तेमाल प्राचीन काल से ही विभिन्न प्रकार की जड़ी-बूटी बनाने में किया जा रहा है। स्वास्थ्य को लेकर भी इसके कई तरह के फायदे बताए जाते रहे है। नीम के पत्ते में बेहतरीन औषधीय गुण होते है। आज भी भारत के कई इलाकों में मानसिक बीमारी को दूर करने के लिए नीम के पत्तों से झाड़ा लगाया जाता है। अगर दांत का दर्द है, तो इसकी दातून का इस्तेमाल किया जाता है। अगर आपको कोई छूत की बीमारी है, तो नीम के पत्तों पर लिटाया जाता है, क्योंकि यह आपके सिस्टम को साफ कर ऊर्जा से भर देता है। चाहे आप इसकी हरी पत्तियों या तेल का सेवन करें, यह हर रूप में फायदेमंद होता है। आयुर्वेद और हाल के शोध में यह पाया गया है कि नीम का पेड़ कई प्रकार की बीमारियों से लड़ने में मदद कर सकता है। आजकल बाजार में नीम के कैप्सूल भी आने लगे हैं। इन्हे भी कई तरह की शारीरिक परेशानियों से बचने के लिए उपयोग किया जा सकता है।


त्वचा में निखार- 

  नीम में मुहांसों और तैलीय त्वचा को नियंत्रित करने संबंधीं गुण पाए जाते हैं। नीम में पाई जाने वाली कड़वाहट त्वचा के ऊपर के छिद्रों को फैलने से रोकती है। इसके अलावा इसमें एंटीबैक्टीरियल एवं एंटी-वायरल तत्व भी पाए जाते हैं। नीम के तेल की कुछ बूंदे चेहरे को सुंदर बना सकती हैं। इससे त्वचा में निखार भी आता है।

गठिया में फायदेमंद - 
सबसे बड़ा हकीम आपका नीम
Neem Oil

गठिया या आर्थराइटिस के इलाज में नीम की जड़ी-बूटियों का काफी उपयोग किया जाता है। खासतौर से ऑस्टियोआर्थराइटिस और रयूमेटाइड आर्थराइटिस में। यह जोड़ो की सूजन और दर्द को कम करने में मदद करता है। एक मुट्ठी नीम की पत्तियों को एक गिलास पानी में उबाल लें। अब पानी को छान लें और ठंडा होने दें। इस पानी का सेवन दिन में दो बार करें। ऐसा लगातार एक महीने तक करने से गठिया के दर्द और सूजन में काफी फायदा मिलेगा।

बैक्टीरिया नाशक - 

हमारे चारो ओर बैक्टीरिया होते हैं। हमारा शरीर बैक्टीरिया से भरा हुआ हैं। एक सामान्य आकार के शरीर में लगभग दस खरब कोशिकाएं होती हैं और सो खरब से भी ज्यादा बैक्टीरिया होते हैं। आप एक हैं, तो वे दस हैं। अपके भीरत इतने सारे जीव हैं कि आप कल्पना भी नहीं कर सकते। इनमें से ज्यादातर बैक्टीरिया हमारे लिए फायदेमंद होते है। इनके बिना हम जिंदा नही रह सकते, लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं, जो हमारे लिए मुसीबत बन सकते हैं, तो वह हानिकारक बैक्टीरिया को आपकी आंतो में ही नष्ट कर देता है।
  
 फंगल इंफेक्शन को नियंत्रित करने में कारगर - 

नीम फंगल इंफेक्शन को नियंत्रित करने में काफी फायदमंद होता है। इसके लिए नीम के तेल को नारियल के तेल के साथ मिलाकर प्रभावित जगह पर लगाए या फिर नीम के कैप्सूल को खोलकर उसके पदार्थ को ऑर्गेनिक नारियल तेल में मिलाएं। यह मिश्रण शरीर के किसी भी हिस्से में फगंल इन्फेक्शन को नियंत्रित करता हैं।

सबसे बड़ा हकीम आपका नीम




















डायबिटीज को नियंत्रित - 

दिन में नीम के कैप्सूल को दो बार लेने से डायबिटीज को नियंत्रित करने में मदद मिलती है। नीम की पत्तियों के रस में ऐसे घटक पाए जाते हैं, जो डायबिटीस के मरीज की इन्सुलिन की जरूरत को कम करते है। इसके आलावा डायबिटीज से बचे रहने के लिए रोज सुबह 4 से 5 नीम की पत्तियों को चबाकर खा सकते हैं।

कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित करने में मददगार - 

सादा पानी में नीम का एक कैप्सूल रोजाना रात में लेने से कोलेस्ट्राल की मात्रा को नियंत्रित करने में मदद मिलती है। आप रोजाना सुबह पानी के साथ एक चम्मच त्रिफला पाउडर भी ले सकती हैं।

पेट की सूजन से आराम - 

दिन में दो बार पानी के साथ नीम के कैप्सूल लेने से पेट की सूजन से आराम मिलता है। इसके अलावा यह आपकी डाइट को प्रोबायोटिक भी करता है। चाय और कॉफी के सेवन की मात्रा को कम करने का प्रयास करें। 

साधना के लिए नीम - 

नीम आपके सिस्टम को साफ रखने के साथ उसको खोलने में भी खासतौर से लाभकारी होता है। इन सबसे बढ़कर यह शरीर में गर्मी पैदा करता है। शरीर में इस तरह की गर्मी हमारे अंदर साधना के द्वारा तीव्र और प्रचंड ऊर्जा पैदा करने में बहुत मदद करती हैं। 

नहाने में भी उपयोग - 

उबले हुए पानी में नीम का पाउडर या नीम के कैप्सूल के अंदर का पदार्थ मिलाकर रातभर के लिए छोड़ दें। अब सुबह इस एंटीबैक्टीरियल पानी से नहाएं। 
नीम के फायदे चेहरे और त्वचा के लिए नीम के फायदे चेहरे और त्वचा के लिए Reviewed by YoGi on 9:24 PM Rating: 5

Study Point संपादकीय

2:09 PM
संपादकीय

बचपनबचपन अबोध होता है। यह पूरी तरह आभिभावकों पर निर्भर करता है। और आवश्यकताएं भी कम होती है। जैसे-जैसे हम उम्रदराज होते चले जाते है। अर्थात युवावस्था में प्रवेश करते है। हमारी आवश्यकताएं बढ़ती चली जाती हैं। लेकिन हम फिर भी अपने अभिभावकों पर ही निर्भर रहते हैं। ऐसी निर्भरता को हमें जल्द से जल्द समाप्त कर देने चाहिए। क्योंकि इस प्रकार की निर्भरता अभिभावकों पर धीरे-धीरे बोझिल होने लगती हैं, जो कि किसी भी प्रकार से ठीक नहीं होती। दुनिया में ऐसे लोगों के सैकड़ो उदाहरण हैं, जो अपने जीवन को नियंत्रण में रखना पसंद करते हैं और
युवावस्था

अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए किसी दूसरे पर निर्भर नहीं रहना चाहते। अधिकांशत: ऐसे लोग आत्मनिर्भर कहलाते हैं और वे खुद को ज्यादा खुश महसूस करते है। व्यक्ति का आत्मनिर्भर होना एक बहुत अच्छी खूबी है। प्रत्येक व्यक्ति आत्मनिर्भर बनने के लिए कुछ अलग करता है। लेकिन उन अलग तरीकों में कुछ समानताएं भी होती हैं जैसे-वह सबसे पहले स्वयं की वास्तविकता का आकलन करता है, वह स्वयं के बेहतर बनाने के लिए तत्पर रहता है। और दूसरों की गलतियों से सीख लेता है। ये कुछ ऐसे घटक हैं, जो हमें आत्मनिर्भरता की तरफ ले जाते हैं।
आत्मनिर्भर
Study Point संपादकीय Study Point संपादकीय   Reviewed by YoGi on 2:09 PM Rating: 5

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